छुरा ब्लॉक में संचालित श्री संकल्प छत्तीसगढ़ मिशन हॉस्पिटल पर अब और भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि संबंधित संस्था ने जनरल सर्जरी की विधिवत अनुमति (पंजीयन) ही नहीं ली है और न ही अस्पताल में 24 घंटे जनरल सर्जन की उपलब्धता है इसके बावजूद आंत (इंटेस्टाइन) की इमरजेंसी सर्जरी की गई। आंत फटना या फंसना मेडिकल इमरजेंसी
विशेषज्ञों के अनुसार, आंत का फटना (Intestinal Perforation) या फंस जाना (Intestinal Obstruction) अत्यंत गंभीर और जानलेवा इमरजेंसी कंडीशन होती है।
ऐसी स्थिति में

तुरंत विशेषज्ञ जनरल सर्जन की आवश्यकता होती है
एनेस्थेटिस्ट और प्रशिक्षित OT टीम अनिवार्य होती है
ICU और वेंटिलेटर सपोर्ट उपलब्ध होना चाहिए
जरूरत पड़ने पर उच्च स्तरीय सेंटर (जिला/मेडिकल कॉलेज) रेफर करना होता है

यदि इन मूलभूत सुविधाओं का अभाव हो, तो सर्जरी करना सीधे तौर पर मरीज की जान जोखिम में डालना माना जाता है।
सबसे बड़ा सवाल
जब जनरल सर्जरी की अनुमति ही नहीं थी, तो पेट फाड़कर ऑपरेशन कैसे किया गया?
क्या बिना पंजीयन के जटिल सर्जरी करना नियमों का खुला उल्लंघन नहीं है?
क्या 24 घंटे सर्जन की अनुपलब्धता में इमरजेंसी केस लेना घोर लापरवाही नहीं ?
यदि यह तथ्य सत्य पाए जाते हैं, तो यह केवल चिकित्सा त्रुटि नहीं बल्कि गंभीर प्रशासनिक और कानूनी उल्लंघन का मामला बनता है।

संभावित कानूनी कार्रवाई
ऐसी स्थिति में निम्न कार्रवाई संभव है
भारतीय न्याय संहिता (BNS) धारा 106 लापरवाही से मृत्यु
Clinical Establishments Act, 2010 के तहत मानक उल्लंघन
छत्तीसगढ़ नर्सिंग होम नियमों के तहत लाइसेंस निरस्तीकरण
संबंधित डॉक्टर पर मेडिकल काउंसिल में अनुशासनात्मक कार्रवाई
जनता का सवाल
“जब अस्पताल के पास अनुमति और विशेषज्ञ नहीं थे, तो इमरजेंसी सर्जरी करने का साहस कैसे किया गया अब नजरें मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) की जांच पर टिकी हैं।
यदि अनुमति नहीं थी और फिर भी ऑपरेशन किया गया
तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि नियमों की खुली अवहेलना और एक परिवार के भविष्य से खिलवाड़ माना जाएगा।
छुरा ब्लॉक में स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लग गया है। ग्राम दुल्ला, मरार पारा निवासी 45 वर्षीय तलेश्वर पटेल की मौत ने निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। मामला जुड़ा है श्री संकल्प छत्तीसगढ़ मिशन हॉस्पिटल, जहां परिजनों का आरोप है कि “जानकारी होने के बावजूद जान जोखिम में डालकर ऑपरेशन किया गया।”
सरकारी अस्पताल से निजी अस्पताल तक कहाँ हुई चूक ?
तलेश्वर पटेल आवास निर्माण कार्य में लगे थे। छुरा से खिड़की लाने के बाद पेट दर्द हुआ। परिवार पहले उन्हें शासकीय अस्पताल छुरा ले गया।
एक दिन भर्ती रखने के बाद डॉक्टरों ने जिला अस्पताल, महासमुंद या अन्यत्र ले जाने की सलाह देकर रेफर कर दिया।
परिजनों का आरोप है
“न सही इलाज मिला, न स्पष्ट मार्गदर्शन। अगर उसी समय गंभीरता समझकर सही दिशा दी जाती, तो शायद जान बच जाती।”
सरकारी अस्पताल से निराश परिवार ने बेहतर इलाज की उम्मीद में निजी अस्पताल का रुख किया और यहीं से शुरू हुई एक ऐसी कहानी, जो मौत पर खत्म हुई।
“डायग्नोसिस के नाम पर दौड़” राजिम से छुरा तक
निजी अस्पताल में भर्ती करने के बाद मरीज को जांच हेतु राजिम भेजा गया। MRI जांच संजीवनी डायग्नोस्टिक सेंटर में कराई गई।
रिपोर्ट में आंत में सूजन, शौच न होना, उल्टी और भोजन न पचने की समस्या बताई गई।
परिजनों का कहना है कि तलेश्वर राजिम तक सामान्य बातचीत कर रहे थे। हालत इतनी गंभीर नहीं लग रही थी कि तत्काल जानलेवा सर्जरी की जरूरत पड़े।
“ऑपरेशन भगवान भरोसे” – फिर भी रात 9 बजे सर्जरी!
परिवार का आरोप है कि MRI देखने के बाद हेमचंद देवांगन ने रात 9 बजे ऑपरेशन का निर्णय लिया।
सबसे चौंकाने वाली बात
“ऑपरेशन कर रहे हैं, भगवान भरोसे है… मौत भी हो सकती है।”
यदि स्वयं संचालक को सफलता पर भरोसा नहीं था, तो सवाल उठता है
क्या यह चिकित्सा निर्णय था या आर्थिक फैसला?
पैसों का खेल?
परिजनों के अनुसार
₹40,000 नगद ऑपरेशन के लिए
₹70,000 स्मार्ट कार्ड से कुल लगभग ₹1,20,000 संकल्प हॉस्पिटल लिया एवं
₹20,000 दवा व अन्य खर्च हुए सभी खर्च 140000 रुपये हुए है फिर भी नहीं बचा पाए तलेश्वर को परिवार वाले की गंभीर आरोप है कि सुविधा और विशेषज्ञ डॉक्टर की कमी के बावजूद सर्जरी इसलिए आनंद फानन में की गई सर्जरी “मरीज हाथ से निकल न जाए।”
क्यों राजिम से रायपुर रेफर नहीं किया गया ?
यदि विशेषज्ञ और संसाधन उपलब्ध नहीं थे, तो क्या यह “जानबूझकर जोखिम लेना” नहीं था ?
छत्तीसगढ़ नर्सिंग होम अधिनियम – लाइसेंस निरस्तीकरण
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम क्षतिपूर्ति दावा
परिवार की स्पष्ट मांग है
अस्पताल का लाइसेंस निरस्त हो
जिम्मेदार डॉक्टर पर आपराधिक मामला दर्ज हो
जेल की कार्रवाई हो
CMHO द्वारा स्वतंत्र जांच टीम गठित की जाए
“एक परिवार उजड़ गया”
तलेश्वर पटेल परिवार के मुखिया थे। आज पत्नी और बच्चों के सामने रोजी-रोटी का संकट है।
ग्रामीणों का आक्रोश साफ है
“अगर सुविधा नहीं थी, तो पेट क्यों फाड़ा? समय रहते रेफर करते तो जान बच सकती थी।”
अब पूरा क्षेत्र पूछ रहा है
क्या यह चिकित्सा लापरवाही है या पैसे की लालच में लिया गया जानलेवा फैसला?
श्री संकल्प छत्तीसगढ़ मिशन हॉस्पिटल में हुई मौत का जिम्मेदार कौन
न अनुमति, न 24 घंटे सर्जन… फिर कैसे हुई इमरजेंसी आंत की सर्जरी
कानूनी दृष्टि से गंभीर चिकित्सीय लापरवाही का विवरण
उपलब्ध अभिलेखों एवं तथ्यों के अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि श्री संकल्प छत्तीसगढ़ मिशन हॉस्पिटल द्वारा मरीज के उपचार में गंभीर एवं आपत्तिजनक लापरवाही (Gross Medical Negligence) बरती गई है।
प्रथम दृष्टया यह पाया गया कि उक्त संस्थान के पास स्वास्थ्य विभाग से आवश्यक वैध अनुमति सर्जरी के लिए उपलब्ध नहीं था, जो कि संबंधित प्रावधानों का प्रत्यक्ष उल्लंघन है। इसके अतिरिक्त अस्पताल परिसर में 24 घंटे योग्य एवं पंजीकृत जनरल सर्जेंन चिकित्सक की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित नहीं की गई, जो कि मानक उपचार प्रोटोकॉल के विरुद्ध है।
और भी गंभीर तथ्य यह है कि संस्थान में आवश्यक नैदानिक सुविधाएँ — जैसे सोनोग्राफी तथा सीटी स्कैन की समुचित व्यवस्था — उपलब्ध नहीं थी। ऐसी आवश्यक जाँच सुविधाओं के अभाव
पर, सटीक एवं मानक अनुसार निदान (Proper and Timely Diagnosis) किया जाना संदिग्ध एवं अविश्वसनीय प्रतीत होता है।
उपरोक्त समस्त परिस्थितियाँ यह दर्शाती हैं कि संबंधित अस्पताल द्वारा स्थापित चिकित्सीय मानकों, नर्सिंग होम एक्ट तथा मरीज सुरक्षा प्रोटोकॉल का गंभीर उल्लंघन किया गया है, जो विधि अनुसार चिकित्सीय लापरवाही की श्रेणी में आता है।
अतः प्रकरण प्रथम दृष्टया जांच एवं विधिसम्मत कार्यवाही योग्य प्रतीत होता है।
पूर्व में भी एक व्यक्ति की मृत्यु की जांच लंबित है, इसके बावजूद शासन द्वारा ऐसे अस्पताल को खुलेआम छूट देना गंभीर चिंता का विषय है।

















