गरियाबंद | 18 फरवरी
पांडुका स्थित के.वी. लक्ष्मी मेडिकल स्टोर्स को लेकर धरोहर संदेश में प्रकाशित खबर के बाद औषधि विभाग हरकत में आया। सूचना के आधार पर औचक निरीक्षण किया गया, जिसमें दो दवाओं पर संदेह होने पर उनके नमूने जांच हेतु रायपुर स्थित औषधि जांच प्रयोगशाला भेजे गए हैं। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही दवाओं की गुणवत्ता स्पष्ट होगी।

निरीक्षण के दौरान एक्सपायरी दवाओं की मौजूदगी, भंडारण में अनियमितता और लाइसेंस शर्तों के उल्लंघन की आशंका सामने आई। कार्रवाई औषधि निरीक्षक धर्मवीर सिंह ध्रुव द्वारा की गई और रिपोर्ट उच्च अधिकारियों को प्रेषित की गई है। दवा गुणवत्ता व लाइसेंस संबंधी प्रावधान Drugs and Cosmetics Act, 1940 के अंतर्गत आते हैं, जिसके तहत दोष सिद्ध होने पर कड़ी कार्रवाई संभव है।

कार्रवाई औषधि निरीक्षक धर्मवीर सिंह ध्रुव द्वारा की गई। विभाग का कहना है कि यह कदम जनता को सुरक्षित दवाएं उपलब्ध कराने और नकली/घटिया दवाओं पर रोक लगाने के लिए उठाया गया है।
अब सबकी निगाहें जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। यदि दवाएं अमानक पाई जाती हैं तो संबंधित के खिलाफ कड़ी वैधानिक कार्रवाई तय मानी जा रही है।
सवाल यह है — क्या लंबे समय से चल रही अनियमितताओं पर अब सख्ती होगी या कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित रहेगी?

लेकिन बड़ा मुद्दा अभी भी अनछुआ…
धरोहर संदेश में यह भी प्रकाशित किया गया था कि मेडिकल स्टोर की आड़ में पीछे रमाकांत सिन्हा के द्वारा नर्सिंग होम की तरह मरीजों को भर्ती किया जाता है। सूत्रों के अनुसार ग्राम कुटेना से आए एक मरीज को पीछे भर्ती कर ड्रिप चढ़ाई गई थी। तो मामला केवल दवाओं की गुणवत्ता का नहीं, बल्कि अवैध क्लीनिक संचालन का भी है।
बिना पंजीयन नर्सिंग होम/क्लीनिक संचालन Clinical Establishments (Registration and Regulation) Act, 2010 का उल्लंघन माना जा सकता है।
एक विभाग सक्रिय, दूसरा मौन क्यों?
ड्रग इंस्पेक्टर ने छापा मारकर सैंपल जब्त किए, लेकिन सवाल यह है कि
क्या स्वास्थ्य विभाग मौन नर्सिंग होम संचालन की वैध अनुमति नहीं है? फिर भी खुले आम धड़ले से चल रहा नर्सिंग होम अवैध ,
पंजीकृत चिकित्सक उपलब्ध नहीं हैं?
वही भर्ती लेकर इलाज किया जा रहा है, तो स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी बनती है कि वह संयुक्त जांच कर स्थिति स्पष्ट करे।
जनता में सवाल
स्थानीय लोगों का कहना है कि समाचार का असर एक विभाग पर तो हुआ, लेकिन दूसरा विभाग अब भी मौन है। क्या अवैध भर्ती सेंटर की जांच होगी या मामला केवल दवा सैंपल तक सीमित रह जाएगा?
अब निगाहें इस बात पर हैं कि स्वास्थ्य विभाग भी संज्ञान लेकर कार्रवाई करता है या फिर फाइलों में ही मामला सिमट जाएगा।

















