गरियाबंद में आयुष्मान योजना की आड़ में निजी अस्पताल का खेल ? गांव-गांव मेडिकल कैंप, मितानिनों के सहारे मरीजों को रेफर करने की शिकायत

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गरियाबंद में आयुष्मान योजना की आड़ में निजी अस्पताल का खेल ? गांव-गांव मेडिकल कैंप, मितानिनों के सहारे मरीजों को रेफर करने की शिकायत

तीन साल से अस्पताल में एक भी मरीज नहीं आने का दावा, फिर भी अस्पताल संचालन पर सवाल, पार्किंग से लेकर डॉक्टरों की मौजूदगी तक उठीं गंभीर शिकायतें, जांच टीम पहुंची तो अब कार्रवाई का इंतजार।

जिला गरियाबंद। गरीब और जरूरतमंद परिवारों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से संचालित आयुष्मान भारत योजना क्या कुछ निजी अस्पतालों के लिए कमाई का जरिया बनती जा रही है? गरियाबंद जिले में सामने आई एक शिकायत ने स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था और आयुष्मान योजना के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मिली जानकारी एवं शिकायत के अनुसार, एक निजी नर्सिंग होम को लेकर आरोप लगाया गया है कि पिछले लगभग तीन वर्षों से अस्पताल में एक भी मरीज नहीं पहुंचा, इसके बावजूद अस्पताल संचालन को लेकर गतिविधियां जारी हैं। आरोप है कि आयुष्मान कार्ड की सुविधा प्राप्त होने के बाद अस्पताल प्रबंधन द्वारा गांव-गांव में मेडिकल कैंप आयोजित करने की योजना बनाई गई। इन कैंपों में मितानिनों का सहयोग लेकर ग्रामीणों तक पहुंच बनाई जा रही है।

मेडिकल कैंप के नाम पर मरीजों को निजी अस्पताल भेजने की तैयारी?

शिकायत में सबसे गंभीर सवाल यह उठाया गया है कि गांवों में मेडिकल कैंप लगाने के पीछे वास्तविक उद्देश्य मरीजों को स्वास्थ्य सुविधा देना है या फिर कैंप के माध्यम से मरीजों को चिन्हित कर अपने निजी अस्पताल में रेफर करना?

आरोप है कि मितानिनों के सहयोग से ग्रामीणों को कैंप तक लाया जाता है और फिर उन्हें निजी अस्पताल में उपचार के लिए भेजने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मरीजों को उनकी वास्तविक बीमारी और जरूरत के आधार पर रेफर किया जा रहा है या आयुष्मान कार्ड धारकों को निजी अस्पताल तक पहुंचाने का कोई दूसरा उद्देश्य है?

यदि इन आरोपों में सच्चाई है तो यह न केवल स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए गंभीर विषय है, बल्कि आयुष्मान योजना की पारदर्शिता पर भी बड़ा सवाल है।

अस्पताल में पार्किंग नहीं, डॉक्टरों की मौजूदगी पर भी सवाल!

शिकायत केवल मेडिकल कैंप तक सीमित नहीं है। अस्पताल की मूलभूत सुविधाओं को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोपों के मुताबिक अस्पताल में पार्किंग व्यवस्था से लेकर डॉक्टरों की नियमित उपलब्धता तक कई खामियां हैं।

सवाल यह है कि जिस अस्पताल में आवश्यक सुविधाओं और डॉक्टरों की उपलब्धता को लेकर शिकायतें हैं, उसे आयुष्मान योजना के अंतर्गत मरीजों का उपचार करने की अनुमति किस आधार पर मिली? अस्पताल के पंजीयन, मान्यता, डॉक्टरों की नियुक्ति, उपलब्ध उपकरणों और मरीजों के उपचार संबंधी रिकॉर्ड की जांच जरूरी है।

जांच टीम पहुंची, अब देखना है कार्रवाई होगी या सिर्फ खानापूर्ति?

शिकायत के बाद स्वास्थ्य विभाग की जांच टीम अस्पताल पहुंची। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जांच टीम ने मौके पर वास्तव में क्या-क्या जांच की? क्या डॉक्टर मौके पर उपस्थित मिले? क्या अस्पताल में मरीजों के उपचार का रिकॉर्ड उपलब्ध था? क्या पिछले तीन वर्षों के ओपीडी, आईपीडी, और रेफरल रिकॉर्ड की जांच की गई?

या फिर केवल औपचारिक निरीक्षण कर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?

  • पिछले तीन वर्षों में अस्पताल में कितने मरीजों का उपचार हुआ?
  • मेडिकल कैंप लगाने की अनुमति किस विभाग से ली गई?
  • मितानिनों को कैंप में किसकी अनुमति से शामिल किया गया?
  • क्या मरीजों को रेफर करने का कोई लिखित रिकॉर्ड रखा जा रहा है?
  • जांच के दौरान डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ और आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं मौके पर मौजूद थीं या नहीं?
  • यदि अस्पताल में खामियां मिली हैं तो क्या उसका पंजीयन और आयुष्मान योजना की संबद्धता जांच के दायरे में आएगी?

अब स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। आयुष्मान कार्ड गरीब परिवारों के इलाज का अधिकार है, किसी निजी अस्पताल के लिए मरीज जुटाने का माध्यम नहीं। यदि शिकायत सही पाई जाती है तो नियमानुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। जांच रिपोर्ट सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।

आयुष्मान कार्ड की आड़ में अस्पताल का खेल?

गांव-गांव कैंप, मरीजों को निजी अस्पताल भेजने की कोशिश !

देखना यह है कि स्वास्थ्य विभाग केवल थाना पूर्ति करेंगी या फिर कार्यवाही करेगी या स्वास्थ्य विभाग की मिली भगत से जांच ठंडे अवस्था में चली जाएगी