वनमंडल गरियाबंद में RTI की जानकारी पर ताला WPC/WPS का हवाला,सूचना रोकने के तरीके पर उठे सवाल, आखिर किस आदेश के आधार पर रोकी जा रही जानकारी ?

0
54

छुरा/गरियाबंद। सरकारी कामकाज में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत जब सरकारी विभागों से जानकारी मांगी जाती है, तो उसका जवाब मिलना आवेदक का वैधानिक अधिकार है। लेकिन वनमंडल गरियाबंद में आरटीआई आवेदनों के निराकरण को लेकर उठ रहे सवालों ने एक नई बहस छेड़ दी है। आरोप है कि वन विभाग के कुछ मामलों में उच्च न्यायालय से संबंधित WPC/WPS प्रकरण क्रमांकों का हवाला देकर मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने से इनकार किया जा रहा है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या संबंधित न्यायालयीन आदेश वास्तव में सूचना देने पर रोक लगाता है, या फिर केवल प्रकरण क्रमांक का उल्लेख ही जानकारी रोकने का आधार बनाया जा रहा है?

मामला वन मार्ग निर्माण कार्य से संबंधित मजदूरी भुगतान सूची की जानकारी मांगने से जुड़ा है। आवेदक प्रकाश कुमार यादव द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत संबंधित दस्तावेज मांगे जाने पर आरोप है कि वनमंडलाधिकारी गरियाबंद मयंक पाण्डेय की ओर से WPC क्रमांक 3707/2023 का हवाला देते हुए जानकारी उपलब्ध कराना संभव नहीं बताया गया। इस घटनाक्रम के बाद सूचना रोकने के आधार और न्यायालयीन प्रकरण की वास्तविक प्रासंगिकता को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

प्रकरण क्रमांक बताया, लेकिन आदेश में क्या है?

आरटीआई के तहत जानकारी देने से इनकार करने के मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि संबंधित न्यायालय ने वास्तव में क्या आदेश दिया है। यदि किसी न्यायालय ने किसी विशेष दस्तावेज अथवा सूचना के प्रकटीकरण पर स्पष्ट रोक लगाई है, तो उसका पालन करना आवश्यक है। लेकिन यदि आदेश का दायरा किसी अन्य विषय तक सीमित है, तो उसे प्रत्येक आरटीआई आवेदन पर स्वतः लागू मान लेना भी उचित नहीं होगा।

आवेदक पक्ष का कहना है कि विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि संबंधित WPC/WPS प्रकरण में किस प्रकार का आदेश पारित हुआ है, आदेश की कौन-सी शर्त मांगी गई सूचना पर लागू होती है और सूचना उपलब्ध नहीं कराने के पीछे विधिक आधार क्या है। केवल प्रकरण क्रमांक का उल्लेख कर दिए जाने से यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि संबंधित सभी अभिलेखों का खुलासा प्रतिबंधित है।

चार वन परिक्षेत्रों में भी उठ रहे सवाल

वनमंडल गरियाबंद के अंतर्गत गरियाबंद, नवागढ़, मैनपुर और इंदागांव वन परिक्षेत्रों से संबंधित आरटीआई आवेदनों के निराकरण को लेकर भी इसी तरह की शिकायतें सामने आने का दावा किया जा रहा है। आवेदकों का आरोप है कि जानकारी मांगने पर उन्हें न्यायालयीन मामलों अथवा कानूनी प्रावधानों का हवाला दिया जाता है, जिससे सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया लंबी हो जाती है।

हालांकि, इन सभी मामलों में एक समान कारण से सूचना रोके जाने की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित आदेशों की प्रतियां सार्वजनिक रूप से सामने आना आवश्यक है। इसके बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि अलग-अलग आवेदनों में विभाग ने किन आधारों पर निर्णय लिया।

प्रथम अपील के बाद भी नहीं मिला समाधान?

आरटीआई आवेदकों का कहना है कि प्रथम अपीलीय अधिकारी के समक्ष अपील किए जाने के बाद भी कुछ मामलों में अपेक्षित जानकारी नहीं मिल पा रही है। यदि प्रथम अपील के स्तर पर भी सूचना देने से इनकार किया जाता है, तो उसके कारणों और वैधानिक आधार का स्पष्ट उल्लेख महत्वपूर्ण हो जाता है।

सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 7(8) के अनुसार, सूचना देने से इनकार किए जाने पर संबंधित लोक सूचना अधिकारी को अस्वीकृति के कारण, अपील की अवधि तथा अपीलीय प्राधिकारी के विवरण की जानकारी देनी होती है। वहीं, धारा 8 के तहत कुछ श्रेणियों की सूचनाओं को प्रकटीकरण से छूट दी गई है। किसी विशेष मामले में इन प्रावधानों का उपयोग उचित है या नहीं, यह आवेदन में मांगी गई सूचना और संबंधित अभिलेखों के आधार पर तय किया जाना चाहिए।

मजदूरी भुगतान सूची और मस्टर रोल में ऐसा क्या है?

वन मार्ग निर्माण कार्यों में मजदूरी भुगतान सूची, मस्टर रोल, कार्यादेश, माप पुस्तिका, भुगतान विवरण और कार्य पूर्णता से संबंधित अभिलेख सार्वजनिक धन के उपयोग से जुड़े होते हैं। इन दस्तावेजों से यह जांचने में मदद मिल सकती है कि कार्य में कितने मजदूरों को लगाया गया, उनके नाम पर कितनी मजदूरी दर्ज की गई और भुगतान किस आधार पर किया गया।

यदि ऐसे अभिलेखों के संबंध में जानकारी मांगी जाती है, तो विभाग के लिए आवेदन में उल्लिखित प्रत्येक सूचना की प्रकृति के अनुसार निर्णय लेना जरूरी है। किसी दस्तावेज का न्यायालयीन प्रकरण से संबंध होना और उस दस्तावेज को सार्वजनिक करने पर कानूनी रोक होना दो अलग-अलग बातें हैं। इस अंतर को स्पष्ट किए बिना पूरे मामले पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

बिल-वाउचर और कथित कूटरचित दस्तावेजों की भी जांच की मांग

वन विभाग में कथित फर्जी बिल, वाउचर, कूटरचित दस्तावेजों और वित्तीय अनियमितताओं को लेकर भी आरोप लगाए गए हैं। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि के लिए संबंधित अभिलेखों, भुगतान विवरणों, कार्यस्थल के सत्यापन और सक्षम जांच की आवश्यकता होगी। फिलहाल केवल आरोपों के आधार पर किसी अधिकारी अथवा कर्मचारी को दोषी ठहराना उचित नहीं है।

इसके बावजूद, यदि निर्माण कार्यों और मजदूरी भुगतान से जुड़े दस्तावेजों को लेकर लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं, तो संबंधित अभिलेखों की नियमानुसार जांच और आरटीआई आवेदनों के निराकरण की समीक्षा से स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

अब उठ रहे हैं ये सवाल

वनमंडल गरियाबंद में किन-किन आरटीआई आवेदनों में WPC/WPS प्रकरणों का हवाला देकर सूचना रोकी गई? संबंधित न्यायालयों के वास्तविक आदेश क्या हैं? क्या आदेशों में मांगी गई सूचनाओं के प्रकटीकरण पर स्पष्ट रोक है? प्रथम अपीलों पर क्या निर्णय लिए गए? और मजदूरी भुगतान, निर्माण कार्यों तथा बिल-वाउचर से जुड़े अभिलेखों की जांच किस स्तर पर हुई?

इन सवालों का जवाब संबंधित आदेशों, आरटीआई आवेदनों, विभागीय जवाबों और अपीलीय निर्णयों की समीक्षा से ही सामने आ सकता है।

उच्चस्तरीय समीक्षा की मांग

आवेदक पक्ष ने वनमंडल गरियाबंद में आरटीआई आवेदनों के निराकरण की उच्चस्तरीय समीक्षा कराने की मांग की है। मांग है कि न्यायालयीन प्रकरणों का हवाला देकर रोकी गई सूचनाओं की सूची तैयार की जाए, संबंधित आदेशों की प्रासंगिकता की जांच हो तथा जहां सूचना देने से इनकार किया गया है, वहां वैधानिक आधार की समीक्षा की जाए।

अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि वन विभाग संबंधित न्यायालयीन आदेशों और आरटीआई के जवाबों के आधार पर उठ रहे सवालों का स्पष्ट जवाब देता है या नहीं। यदि सूचना रोकने का आधार विधिसम्मत है, तो आदेश और उसका दायरा स्थिति स्पष्ट कर सकते हैं; और यदि प्रक्रिया में कोई त्रुटि हुई है, तो नियमानुसार सुधार का रास्ता भी खुल सकता है। फिलहाल मामले में अंतिम निष्कर्ष संबंधित दस्तावेजों और सक्षम स्तर की जांच के बाद ही निकाला जा सकेगा।