रायपुर से गांव-गांव पहुंच रही 2से 3 लोगों की टीम पर ग्रामीण चिकित्सकों को डराने का आरोप; फोटो, फॉर्म, पंपलेट , स्वास्थ्य विभाग की भूमिका भी जांच के घेरे में
गरियाबंद, छत्तीसगढ़ धरोहर संदेश विशेष पड़ताल

गरियाबंद जिले में ग्रामीण क्षेत्रों में इलाज करने वाले कथित झोलाछाप डॉक्टरों से CCH (Certificate Courses in Community Health) प्रमाणपत्र के नाम पर ₹50-50 हजार की मांग किए जाने का मामला सामने आया है। शिकायतकर्ता के अनुसार, रायपुर से दो या तीन लोगों की टीम बनाकर गांव-गांव पहुंचा जाता है। टीम ग्रामीण चिकित्सकों के पास जाकर पहले उनकी फोटो खींचती है, फिर एक फॉर्म भरवाकर पूछा जाता है कि उन्होंने कहां से डिग्री प्राप्त की है, किस संस्था से पढ़ाई की है, लाइसेंस कहां से लिया है और किस आधार पर मरीजों का इलाज कर रहे हैं। इस पूरी प्रक्रिया को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में इलाज करने वाले लोगों के बीच डर और चिंता का माहौल बनने की बात कही गई है।

शिकायतकर्ता के अनुसार, ग्रामीण चिकित्सकों के पास जब मान्य चिकित्सा डिग्री या पंजीयन नहीं होता, तो रायपुर से पहुंची टीम उनके पास मौजूद दस्तावेजों को फर्जी बताकर कहती है कि इस आधार पर डॉक्टरी नहीं कर सकते और मरीजों का इलाज करना गलत है। आरोप है कि इसी स्थिति का फायदा उठाकर उन्हें जीवन समृद्धि सहयोग संस्था, रायपुर से जुड़ने और CCH प्रमाणपत्र लेने के लिए कहा जाता है। संबंधित लोगों द्वारा कथित रूप से यह भरोसा दिलाया जाता है कि संस्था से जुड़ने, निर्धारित रकम देने और प्रमाणपत्र व मार्कशीट प्राप्त करने के बाद वे ग्रामीण क्षेत्र में इलाज कर सकेंगे। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस प्रमाणपत्र के आधार पर इलाज करने का भरोसा दिया जा रहा है, उसकी वास्तविक मान्यता क्या है और उसे जारी करने का अधिकार किसके पास है?

₹50 हजार की मांग, प्रमाणपत्र और मार्कशीट देने की बात
इस मामले में सबसे गंभीर आरोप रकम की मांग को लेकर है। शिकायतकर्ता का कहना है कि गरियाबंद जिले में प्रति व्यक्ति ₹50 हजार जा रहा है उनके पास संबंधित संस्था का पंपलेट, और CCH फॉर्म भरने का दिखावा भी किया जाता है अब फॉर्म भरा जाता है शिकायतकर्ता के अनुसार, बातचीत में प्रमाणपत्र और मार्कशीट देने की बात कही गई है। यह भी दावा किया गया है कि छत्तीसगढ़ के दूसरे जिलों में कथित तौर पर ₹1 लाख से ₹1.5 लाख तक की रकम मांगे जाने की बातें सामने आई हैं। इन रकमों का वास्तविक आधार क्या है, क्या इसकी कोई अधिकृत शुल्क-सूची है, भुगतान की रसीद किस नाम से दी जाती है और प्रमाणपत्र किस संस्थान से जारी होता है इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना जरूरी है।

आरोप है कि ग्रामीण चिकित्सकों को पहले उनकी योग्यता और दस्तावेजों के बारे में पूछकर डराया जाता है, फिर कहा जाता है कि यदि वे संस्था से नहीं जुड़ेंगे तो उनके खिलाफ कलेक्टर के पास शिकायत की जाएगी और उन्हें जेल जाना पड़ सकता है। शिकायतकर्ता के मुताबिक, इस तरह का दबाव बनाकर लोगों को तुरंत फॉर्म भरने और भुगतान करने के लिए कहा जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में पहले से कार्रवाई का डर झेल रहे लोग ऐसे प्रस्तावों के झांसे में आ सकते हैं। यदि किसी व्यक्ति के पास मान्य चिकित्सा योग्यता नहीं है, तो उसके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई करना स्वास्थ्य विभाग का काम है; लेकिन इसी डर का इस्तेमाल करके किसी निजी संस्था से जुड़ने और रकम देने के लिए दबाव बनाए जाने का आरोप अपने आप में गंभीर जांच का विषय है।

इस मामले में उपलब्ध कराए गए CCH Form.pdf को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। पहले की पड़ताल में इस दस्तावेज में CCH पाठ्यक्रम से संबंधित सामग्री, राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (NIOS) के नाम वाले पत्रों, पैरामेडिकल पाठ्यक्रम से जुड़े दस्तावेजों, प्रमाणपत्रों और आवेदन फॉर्म जैसी सामग्री का उल्लेख सामने आया था। दस्तावेजों में NIOS, AVI तथा संजीवनी पैरामेडिकल कॉलेज दुर्ग और संबंधित शैक्षणिक संस्था या सोसायटी के नामों का उल्लेख होने की बात कही गई है। हालांकि, किसी दस्तावेज में किसी संस्था या शैक्षणिक निकाय का नाम होना अपने आप यह साबित नहीं करता कि जीवन समृद्धि सहयोग संस्था को वर्तमान में CCH प्रमाणपत्र जारी करने या किसी व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से चिकित्सा करने का अधिकार प्राप्त है।
इसलिए संबंधित संस्था को स्पष्ट करना चाहिए कि CCH पाठ्यक्रम वास्तव में किस संस्थान द्वारा संचालित किया जा रहा है, प्रवेश और परीक्षा की जिम्मेदारी किसकी है, प्रमाणपत्र और मार्कशीट कौन जारी करेगा तथा इनकी मान्यता किस सरकारी या अधिकृत शैक्षणिक प्राधिकरण से प्राप्त है। यदि NIOS, AVI या किसी पैरामेडिकल संस्था के नाम का उपयोग किया जा रहा है, तो संबंधित संस्थानों से इसकी आधिकारिक पुष्टि भी आवश्यक है। केवल पुराने पत्र, प्रमाणपत्रों के नमूने, आवेदन फॉर्म या किसी संस्था का नाम दिखाकर वर्तमान मान्यता और चिकित्सा करने की पात्रता साबित नहीं होती।
NGO का पंजीयन और डॉक्टर बनाने का अधिकार अलग-अलग विषय
मामले में जीवन समृद्धि सहयोग संस्था, रायपुर के पंजीयन और स्वास्थ्य विभाग से उसके कथित संबंध को लेकर भी सवाल उठाता है शिकायतकर्ता का कहना है कि संबंधित लोगों द्वारा संस्था का नाम लेकर ग्रामीण चिकित्सकों को जोड़ा जा रहा है। ऐसे में संस्था का वास्तविक पंजीयन किस कानून के अंतर्गत हुआ है, उसके उद्देश्य क्या हैं, उसके पदाधिकारी कौन हैं और क्या उसके पंजीयन दस्तावेजों में इस प्रकार का प्रशिक्षण संचालित करने का प्रावधान है—इन सभी बिंदुओं की जांच होनी चाहिए।
कानूनी रूप से किसी NGO का पंजीकृत होना अपने आप उसे मान्य चिकित्सा डिग्री देने, डॉक्टर के रूप में पंजीकरण कराने या स्वतंत्र रूप से मरीजों का इलाज करने की अनुमति देने का अधिकार नहीं देता। आधुनिक चिकित्सा पद्धति में प्रैक्टिस के लिए लागू कानूनों के अनुसार मान्य चिकित्सा योग्यता और संबंधित रजिस्टर में पंजीकरण आवश्यक होता है। अन्य मान्य चिकित्सा पद्धतियों के लिए भी उनके अपने नियम लागू होते हैं। किसी छोटे अवधि के प्रशिक्षण या पैरामेडिकल पाठ्यक्रम का प्रमाणपत्र अपने आप डॉक्टर के रूप में स्वतंत्र प्रैक्टिस करने का अधिकार नहीं बन जाता। इसलिए ₹50 हजार लेकर प्रमाणपत्र देने का दावा किया जा रहा है, तो उसके साथ मिलने वाली वास्तविक कानूनी पात्रता का लिखित प्रमाण सामने आना चाहिए।
पत्रकारिता और स्वास्थ्य कार्यकर्ता होने का परिचय देने का आरोप
शिकायतकर्ता के अनुसार, गांवों में संपर्क करने वाले कुछ लोग न्यूज से जुड़े होने का परिचय देते हैं और बाद में जीवन समृद्धि सहयोग संस्था, रायपुर तथा स्वास्थ्य कार्यकर्ता के रूप में लोगों से जुड़ने की बात कहते हैं। बातचीत में वर्ल्ड न्यूज सर्विस सहित कुछ मीडिया संस्थानों और पोर्टलों के नामों का उल्लेख होने की जानकारी भी दी गई है।
मामले मे जानकारी लेने पर सुरेंद्र सोनी पहचान और भूमिका की आधिकारिक पुष्टि हुई है किसी व्यक्ति का पत्रकार होना या किसी संस्था से जुड़ा होना अपने आप स्वास्थ्य विभाग की ओर से अधिकार प्राप्त होने का प्रमाण नहीं है। इसी प्रकार, किसी सरकारी अधिकारी या स्वास्थ्यकर्मी से मुलाकात होने मात्र से संस्था को सरकारी मान्यता मिल जाना साबित नहीं होता।
राजिम मेले में स्टॉल लगाने की अनुमति पर सवाल
मेले के दौरान संस्था का स्टॉल लगाए जाने की बात उठाते हुए सवाल किया है कि यदि संस्था को स्वास्थ्य से संबंधित गतिविधियां करने की अनुमति दी गई थी, तो अनुमति किसने दी और किस उद्देश्य से दी गई? क्या संस्था के पंजीयन, प्रशिक्षण कार्यक्रम, प्रमाणपत्र की मान्यता और स्वास्थ्य संबंधी दावों की जांच की गई थी? यदि किसी आयोजन में स्टॉल लगाने की अनुमति मिली थी, तो उससे संस्था को चिकित्सा प्रमाणपत्र जारी करने या किसी व्यक्ति को डॉक्टर के रूप में प्रैक्टिस कराने का अधिकार स्वतः प्राप्त नहीं हो जाता। इस संबंध में आयोजन समिति और संबंधित विभाग से स्पष्ट जानकारी मांगी जानी चाहिए।
झोलाछाप डॉक्टरों पर कार्रवाई क्यों नहीं, और कथित वसूली पर नियंत्रण कौन करेगा?
ग्रामीण क्षेत्रों में बिना मान्य चिकित्सा योग्यता के मरीजों का इलाज करना जनस्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। ऐसे मामलों में स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी है कि वह जांच करे और लागू कानूनों के अनुसार कार्रवाई करे। लेकिन इस मामले में सवाल यह भी है कि यदि गांव-गांव में ऐसे लोग इलाज कर रहे हैं, तो विभाग की निगरानी और कार्रवाई की व्यवस्था कितनी प्रभावी है? क्या इसी कमजोरी का लाभ उठाकर निजी संस्था के नाम पर लोगों को डराया जा रहा है और प्रमाणपत्र के बदले रकम देने के लिए मजबूर किया जा रहा है?
एक तरफ बिना मान्य योग्यता के चिकित्सा करने वालों पर नियमानुसार कार्रवाई जरूरी है, तो दूसरी तरफ किसी संस्था द्वारा प्रमाणपत्र के नाम पर कथित रूप से रकम मांगने और इलाज करने का अधिकार मिलने का भरोसा देने के आरोपों की भी जांच होनी चाहिए। किसी ग्रामीण चिकित्सक को किसी निजी संस्था से जुड़ने या रकम देने से कानूनी संरक्षण नहीं मिलता। यदि उसके पास मान्य योग्यता नहीं है, तो प्रमाणपत्र के नाम पर किया गया कोई आश्वासन उसे स्वतः वैध चिकित्सक नहीं बना सकता।
जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग से सीधे सवाल
गरियाबंद जिला प्रशासन, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO), छत्तीसगढ़ शासन के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग तथा संबंधित शैक्षणिक प्राधिकरण को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या जीवन समृद्धि सहयोग संस्था को CCH पाठ्यक्रम संचालित करने की वर्तमान अनुमति प्राप्त है? प्रमाणपत्र और मार्कशीट जारी करने वाला अधिकृत संस्थान कौन है? क्या ₹50 हजार या अन्य रकम लेने की कोई आधिकारिक शुल्क-सूची है? क्या संस्था के प्रतिनिधियों को स्वास्थ्य कार्यकर्ता के रूप में किसी सरकारी प्राधिकरण ने नियुक्त किया है? क्या राजिम मेले में स्टॉल लगाने की अनुमति दी गई थी और किस आधार पर? क्या स्वास्थ्य विभाग को गांव-गांव जाकर ग्रामीण चिकित्सकों से फॉर्म भरवाने और प्रमाणपत्र के नाम पर रकम मांगे जाने की जानकारी है? और गांव-गांव में जिस प्रकार से ₹50000 झोलाछाप डॉक्टरों से लिया जा रहा है फर्जी तरीके से इस पर सच में जांच कर होनी चाहिए और दोषियों पर कार्यवाही होनी चाहिए फर्जी बताकर डराने और ₹50 हजार मांगने का आरोप! गरियाबंद में CCH प्रमाणपत्र के नाम पर कथित वसूली की शिकायत
- NGO के नाम पर डॉक्टर बनाने का दावा? ग्रामीण चिकित्सकों से ₹50-50 हजार मांगने की शिकायत, प्रशासन से जांच की मांग
- झोलाछाप डॉक्टरों के डर का फायदा उठाकर कथित वसूली! CCH प्रमाणपत्र, मार्कशीट और मान्यता पर बड़े सवाल
कानून की धाराओं के संदर्भ वाली हेडिंग - ₹50 हजार वसूली की शिकायत पर उठे कानूनी सवाल—BNS की धारा 308 (जबरन वसूली) और धारा 318 (छल) के तहत जांच की मांग
रायपुर से गांव-गांव पहुंच रही 2से 3 लोगों की टीम पर ग्रामीण चिकित्सकों को डराने का आरोप; फोटो, फॉर्म, पंपलेट , स्वास्थ्य विभाग की भूमिका भी जांच के घेरे में
गरियाबंद, छत्तीसगढ़ | धरोहर संदेश विशेष पड़ताल
गरियाबंद जिले में ग्रामीण क्षेत्रों में इलाज करने वाले कथित झोलाछाप डॉक्टरों से CCH (Certificate Courses in Community Health) प्रमाणपत्र के नाम पर ₹50-50 हजार की मांग किए जाने का मामला सामने आया है। शिकायतकर्ता के अनुसार, रायपुर से दो या तीन लोगों की टीम बनाकर गांव-गांव पहुंचा जाता है। टीम ग्रामीण चिकित्सकों के पास जाकर पहले उनकी फोटो खींचती है, फिर एक फॉर्म भरवाकर पूछा जाता है कि उन्होंने कहां से डिग्री प्राप्त की है, किस संस्था से पढ़ाई की है, लाइसेंस कहां से लिया है और किस आधार पर मरीजों का इलाज कर रहे हैं। इस पूरी प्रक्रिया को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में इलाज करने वाले लोगों के बीच डर और चिंता का माहौल बनने की बात कही गई है।
शिकायतकर्ता के अनुसार, ग्रामीण चिकित्सकों के पास जब मान्य चिकित्सा डिग्री या पंजीयन नहीं होता, तो रायपुर से पहुंची टीम उनके पास मौजूद दस्तावेजों को फर्जी बताकर कहती है कि इस आधार पर डॉक्टरी नहीं कर सकते और मरीजों का इलाज करना गलत है। आरोप है कि इसी स्थिति का फायदा उठाकर उन्हें जीवन समृद्धि सहयोग संस्था, रायपुर से जुड़ने और CCH प्रमाणपत्र लेने के लिए कहा जाता है। संबंधित लोगों द्वारा कथित रूप से यह भरोसा दिलाया जाता है कि संस्था से जुड़ने, निर्धारित रकम देने और प्रमाणपत्र व मार्कशीट प्राप्त करने के बाद वे ग्रामीण क्षेत्र में इलाज कर सकेंगे। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस प्रमाणपत्र के आधार पर इलाज करने का भरोसा दिया जा रहा है, उसकी वास्तविक मान्यता क्या है और उसे जारी करने का अधिकार किसके पास है?
₹50 हजार की मांग, प्रमाणपत्र और मार्कशीट देने की बात
इस मामले में सबसे गंभीर आरोप रकम की मांग को लेकर है। शिकायतकर्ता का कहना है कि गरियाबंद जिले में प्रति व्यक्ति ₹50 हजार जा रहा है उनके पास संबंधित संस्था का पंपलेट, और CCH फॉर्म भरने का दिखावा भी किया जाता है अब फॉर्म भरा जाता है शिकायतकर्ता के अनुसार, बातचीत में प्रमाणपत्र और मार्कशीट देने की बात कही गई है। यह भी दावा किया गया है कि छत्तीसगढ़ के दूसरे जिलों में कथित तौर पर ₹1 लाख से ₹1.5 लाख तक की रकम मांगे जाने की बातें सामने आई हैं। इन रकमों का वास्तविक आधार क्या है, क्या इसकी कोई अधिकृत शुल्क-सूची है, भुगतान की रसीद किस नाम से दी जाती है और प्रमाणपत्र किस संस्थान से जारी होता है—इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना जरूरी है।
आरोप है कि ग्रामीण चिकित्सकों को पहले उनकी योग्यता और दस्तावेजों के बारे में पूछकर डराया जाता है, फिर कहा जाता है कि यदि वे संस्था से नहीं जुड़ेंगे तो उनके खिलाफ कलेक्टर के पास शिकायत की जाएगी और उन्हें जेल जाना पड़ सकता है। शिकायतकर्ता के मुताबिक, इस तरह का दबाव बनाकर लोगों को तुरंत फॉर्म भरने और भुगतान करने के लिए कहा जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में पहले से कार्रवाई का डर झेल रहे लोग ऐसे प्रस्तावों के झांसे में आ सकते हैं। यदि किसी व्यक्ति के पास मान्य चिकित्सा योग्यता नहीं है, तो उसके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई करना स्वास्थ्य विभाग का काम है; लेकिन इसी डर का इस्तेमाल करके किसी निजी संस्था से जुड़ने और रकम देने के लिए दबाव बनाए जाने का आरोप अपने आप में गंभीर जांच का विषय है।
इस मामले में उपलब्ध कराए गए CCH Form.pdf को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। पहले की पड़ताल में इस दस्तावेज में CCH पाठ्यक्रम से संबंधित सामग्री, राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (NIOS) के नाम वाले पत्रों, पैरामेडिकल पाठ्यक्रम से जुड़े दस्तावेजों, प्रमाणपत्रों और आवेदन फॉर्म जैसी सामग्री का उल्लेख सामने आया था। दस्तावेजों में NIOS, AVI तथा संजीवनी पैरामेडिकल कॉलेज दुर्ग और संबंधित शैक्षणिक संस्था या सोसायटी के नामों का उल्लेख होने की बात कही गई है। हालांकि, किसी दस्तावेज में किसी संस्था या शैक्षणिक निकाय का नाम होना अपने आप यह साबित नहीं करता कि जीवन समृद्धि सहयोग संस्था को वर्तमान में CCH प्रमाणपत्र जारी करने या किसी व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से चिकित्सा करने का अधिकार प्राप्त है।
इसलिए संबंधित संस्था को स्पष्ट करना चाहिए कि CCH पाठ्यक्रम वास्तव में किस संस्थान द्वारा संचालित किया जा रहा है, प्रवेश और परीक्षा की जिम्मेदारी किसकी है, प्रमाणपत्र और मार्कशीट कौन जारी करेगा तथा इनकी मान्यता किस सरकारी या अधिकृत शैक्षणिक प्राधिकरण से प्राप्त है। यदि NIOS, AVI या किसी पैरामेडिकल संस्था के नाम का उपयोग किया जा रहा है, तो संबंधित संस्थानों से इसकी आधिकारिक पुष्टि भी आवश्यक है। केवल पुराने पत्र, प्रमाणपत्रों के नमूने, आवेदन फॉर्म या किसी संस्था का नाम दिखाकर वर्तमान मान्यता और चिकित्सा करने की पात्रता साबित नहीं होती।
NGO का पंजीयन और डॉक्टर बनाने का अधिकार अलग-अलग विषय
मामले में जीवन समृद्धि सहयोग संस्था, रायपुर के पंजीयन और स्वास्थ्य विभाग से उसके कथित संबंध को लेकर भी सवाल उठाता है शिकायतकर्ता का कहना है कि संबंधित लोगों द्वारा संस्था का नाम लेकर ग्रामीण चिकित्सकों को जोड़ा जा रहा है। ऐसे में संस्था का वास्तविक पंजीयन किस कानून के अंतर्गत हुआ है, उसके उद्देश्य क्या हैं, उसके पदाधिकारी कौन हैं और क्या उसके पंजीयन दस्तावेजों में इस प्रकार का प्रशिक्षण संचालित करने का प्रावधान है—इन सभी बिंदुओं की जांच होनी चाहिए।
कानूनी रूप से किसी NGO का पंजीकृत होना अपने आप उसे मान्य चिकित्सा डिग्री देने, डॉक्टर के रूप में पंजीकरण कराने या स्वतंत्र रूप से मरीजों का इलाज करने की अनुमति देने का अधिकार नहीं देता। आधुनिक चिकित्सा पद्धति में प्रैक्टिस के लिए लागू कानूनों के अनुसार मान्य चिकित्सा योग्यता और संबंधित रजिस्टर में पंजीकरण आवश्यक होता है। अन्य मान्य चिकित्सा पद्धतियों के लिए भी उनके अपने नियम लागू होते हैं। किसी छोटे अवधि के प्रशिक्षण या पैरामेडिकल पाठ्यक्रम का प्रमाणपत्र अपने आप डॉक्टर के रूप में स्वतंत्र प्रैक्टिस करने का अधिकार नहीं बन जाता। इसलिए ₹50 हजार लेकर प्रमाणपत्र देने का दावा किया जा रहा है, तो उसके साथ मिलने वाली वास्तविक कानूनी पात्रता का लिखित प्रमाण सामने आना चाहिए।
पत्रकारिता और स्वास्थ्य कार्यकर्ता होने का परिचय देने का आरोप
शिकायतकर्ता के अनुसार, गांवों में संपर्क करने वाले कुछ लोग न्यूज से जुड़े होने का परिचय देते हैं और बाद में जीवन समृद्धि सहयोग संस्था, रायपुर तथा स्वास्थ्य कार्यकर्ता के रूप में लोगों से जुड़ने की बात कहते हैं। बातचीत में वर्ल्ड न्यूज सर्विस सहित कुछ मीडिया संस्थानों और पोर्टलों के नामों का उल्लेख होने की जानकारी भी दी गई है।
मामले मे जानकारी लेने पर सुरेंद्र सोनी पहचान और भूमिका की आधिकारिक पुष्टि हुई है किसी व्यक्ति का पत्रकार होना या किसी संस्था से जुड़ा होना अपने आप स्वास्थ्य विभाग की ओर से अधिकार प्राप्त होने का प्रमाण नहीं है। इसी प्रकार, किसी सरकारी अधिकारी या स्वास्थ्यकर्मी से मुलाकात होने मात्र से संस्था को सरकारी मान्यता मिल जाना साबित नहीं होता।
राजिम मेले में स्टॉल लगाने की अनुमति पर सवाल
मेले के दौरान संस्था का स्टॉल लगाए जाने की बात उठाते हुए सवाल किया है कि यदि संस्था को स्वास्थ्य से संबंधित गतिविधियां करने की अनुमति दी गई थी, तो अनुमति किसने दी और किस उद्देश्य से दी गई? क्या संस्था के पंजीयन, प्रशिक्षण कार्यक्रम, प्रमाणपत्र की मान्यता और स्वास्थ्य संबंधी दावों की जांच की गई थी? यदि किसी आयोजन में स्टॉल लगाने की अनुमति मिली थी, तो उससे संस्था को चिकित्सा प्रमाणपत्र जारी करने या किसी व्यक्ति को डॉक्टर के रूप में प्रैक्टिस कराने का अधिकार स्वतः प्राप्त नहीं हो जाता। इस संबंध में आयोजन समिति और संबंधित विभाग से स्पष्ट जानकारी मांगी जानी चाहिए।
झोलाछाप डॉक्टरों पर कार्रवाई क्यों नहीं, और कथित वसूली पर नियंत्रण कौन करेगा?
ग्रामीण क्षेत्रों में बिना मान्य चिकित्सा योग्यता के मरीजों का इलाज करना जनस्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। ऐसे मामलों में स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी है कि वह जांच करे और लागू कानूनों के अनुसार कार्रवाई करे। लेकिन इस मामले में सवाल यह भी है कि यदि गांव-गांव में ऐसे लोग इलाज कर रहे हैं, तो विभाग की निगरानी और कार्रवाई की व्यवस्था कितनी प्रभावी है? क्या इसी कमजोरी का लाभ उठाकर निजी संस्था के नाम पर लोगों को डराया जा रहा है और प्रमाणपत्र के बदले रकम देने के लिए मजबूर किया जा रहा है?
एक तरफ बिना मान्य योग्यता के चिकित्सा करने वालों पर नियमानुसार कार्रवाई जरूरी है, तो दूसरी तरफ किसी संस्था द्वारा प्रमाणपत्र के नाम पर कथित रूप से रकम मांगने और इलाज करने का अधिकार मिलने का भरोसा देने के आरोपों की भी जांच होनी चाहिए। किसी ग्रामीण चिकित्सक को किसी निजी संस्था से जुड़ने या रकम देने से कानूनी संरक्षण नहीं मिलता। यदि उसके पास मान्य योग्यता नहीं है, तो प्रमाणपत्र के नाम पर किया गया कोई आश्वासन उसे स्वतः वैध चिकित्सक नहीं बना सकता।
जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग से सीधे सवाल
गरियाबंद जिला प्रशासन, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO), छत्तीसगढ़ शासन के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग तथा संबंधित शैक्षणिक प्राधिकरण को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या जीवन समृद्धि सहयोग संस्था को CCH पाठ्यक्रम संचालित करने की वर्तमान अनुमति प्राप्त है? प्रमाणपत्र और मार्कशीट जारी करने वाला अधिकृत संस्थान कौन है? क्या ₹50 हजार या अन्य रकम लेने की कोई आधिकारिक शुल्क-सूची है? क्या संस्था के प्रतिनिधियों को स्वास्थ्य कार्यकर्ता के रूप में किसी सरकारी प्राधिकरण ने नियुक्त किया है? क्या राजिम मेले में स्टॉल लगाने की अनुमति दी गई थी और किस आधार पर? क्या स्वास्थ्य विभाग को गांव-गांव जाकर ग्रामीण चिकित्सकों से फॉर्म भरवाने और प्रमाणपत्र के नाम पर रकम मांगे जाने की जानकारी है? और गांव-गांव में जिस प्रकार से ₹50000 झोलाछाप डॉक्टरों से लिया जा रहा है फर्जी तरीके से इस पर सच में जांच कर होनी चाहिए और दोषियों पर कार्यवाही होनी चाहिए
















