गरियाबंद/लोहरसी ग्राम पंचायत लोहरसी क्षेत्र में रेशम विभाग की नर्सरी से संबंधित लकड़ी की कथित नीलामी को लेकर अब कई गंभीर सवाल सामने आ रहे हैं। मामला केवल लकड़ी की बिक्री तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी संपत्ति की नीलामी की प्रक्रिया, ग्राम पंचायत की भूमिका, विभागीय अनुमति, लकड़ी की कीमत और बिक्री से प्राप्त राशि के हिसाब-किताब को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण स्थिति तब सामने आई जब लकड़ी की राशि को लेकर ग्राम पंचायत के सरपंच और रेशम विभाग की ओर से अलग-अलग बातें सामने आईं। सरपंच लोमस साहू की ओर से बताया गया कि लकड़ी की ₹20 हजार की राशि विभाग में जमा कर दी गई है। वहीं रेशम कार्यालय में मौजूद विभागीय कर्मचारी ललित कुर्रे की ओर से कथित तौर पर कहा गया कि सरपंच द्वारा अभी तक विभाग में किसी प्रकार की राशि जमा नहीं की गई है।

अब सवाल यह है कि दोनों में से सही स्थिति क्या है ? क्या ₹20 हजार विभाग में जमा किए गए हैं या नहीं ? यदि राशि जमा की गई है तो उसकी रसीद, जमा पर्ची अथवा विभागीय रिकॉर्ड में उसका उल्लेख होना चाहिए। यदि राशि जमा नहीं हुई है तो सरपंच द्वारा राशि जमा करने की बात किस आधार पर कही गई—यह भी जांच का विषय है।
मामला केवल ₹20 हजार का नहीं

यह पूरा विवाद सिर्फ ₹20 हजार की राशि तक सीमित नहीं है। मूल सवाल यह है कि रेशम विभाग की नर्सरी की लकड़ी की बिक्री या नीलामी किस प्रक्रिया के तहत की गई?
यदि लकड़ी रेशम विभाग की शासकीय संपत्ति थी तो ग्राम पंचायत अथवा सरपंच को उसकी बिक्री में भूमिका निभाने का अधिकार किस आदेश के तहत मिला ?
क्या रेशम विभाग ने ग्राम पंचायत को लिखित अनुमति दी थी ?
क्या लकड़ी की मात्रा और कीमत का विभागीय मूल्यांकन किया गया था ?
क्या नीलामी के लिए सार्वजनिक सूचना जारी की गई ?
क्या खरीदारों से प्रतिस्पर्धी बोली लगवाई गई ?
क्या नीलामी की कार्यवाही का पंचनामा बनाया गया ?
और सबसे महत्वपूर्ण नीलामी से प्राप्त पूरी राशि सरकारी खाते में किस तारीख को और किस माध्यम से जमा की गई ?
इन सवालों का जवाब संबंधित विभागीय दस्तावेजों से ही स्पष्ट हो सकता है।
18 मई के आवेदन में पहले की लकड़ी बिक्री का भी मुद्दा
जानकारी के अनुसार ग्राम पंचायत लोहरसी के वार्ड क्रमांक 9 के पंच खेमचंद यादव ने 18 मई 2026 को विभिन्न मुद्दों को लेकर आवेदन दिया था। बताया जा रहा है कि आवेदन के बिंदु क्रमांक 9 में पहले बेची गई लकड़ी के हिसाब-किताब को लेकर भी सवाल उठाया गया था।
शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया कि पहले लकड़ी बिक्री से संबंधित राशि, प्रक्रिया और हिसाब-किताब को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई।
यदि पहले भी रेशम विभाग की नर्सरी अथवा उससे संबंधित लकड़ी बेची गई थी, तो उस बिक्री का रिकॉर्ड भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए। कितनी लकड़ी थी, किस दर पर बेची गई, किसे बेची गई और कितनी राशि प्राप्त हुई—इन सभी सवालों का जवाब रिकॉर्ड से मिलना चाहिए।
नीलामी से पहले विभाग को जानकारी देने का दावा
शिकायतकर्ता के अनुसार 9 और 10 जुलाई 2026 को रेशम विभाग के अधिकारियों को लकड़ी की नीलामी के संबंध में पहले ही जानकारी दी गई थी।
बताया गया कि संबंधित अधिकारियों को फोन और व्हाट्सऐप के माध्यम से सूचना दी गई थी कि रेशम विभाग की नर्सरी में रखी लकड़ी को ग्राम पंचायत की ओर से बेचने की तैयारी की जा रही है।
यदि विभाग को नीलामी से पहले जानकारी थी, तो अब यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि विभाग ने उस समय क्या कदम उठाए?
क्या मौके पर जांच की गई?
क्या नीलामी रोकने का प्रयास किया गया?
क्या लकड़ी वास्तव में रेशम विभाग की संपत्ति थी, इसका सत्यापन किया गया?
और यदि नीलामी की अनुमति थी तो उस अनुमति का आदेश क्या था?
विभागीय स्तर पर पहले क्या कहा गया था?
शिकायतकर्ता का कहना है कि विभागीय अधिकारी से बातचीत के दौरान यह बताया गया था कि रेशम विभाग की नर्सरी की लकड़ी इस प्रकार से नहीं बेची जाती।
इसके बाद यदि वही लकड़ी नीलाम हुई है तो सवाल यह है कि नीलामी किस नियम और किस अनुमति के तहत हुई?
यहां किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने से पहले विभागीय रिकॉर्ड की जांच जरूरी है। यदि विभाग ने नीलामी की अनुमति दी थी तो उसका आदेश सामने आना चाहिए और यदि अनुमति नहीं दी थी तो फिर नीलामी कैसे हुई, इसकी जांच होनी चाहिए।
सरपंच को अधिकार किसने दिया?
रेशम विभाग और ग्राम पंचायत की अपनी-अपनी प्रशासनिक व्यवस्थाएं हैं। इसलिए यह सवाल महत्वपूर्ण है कि रेशम विभाग की संपत्ति की बिक्री में ग्राम पंचायत के सरपंच की भूमिका किस आधार पर तय हुई।
यदि सरपंच को विभाग की ओर से कोई जिम्मेदारी दी गई थी तो उसका लिखित आदेश होना चाहिए।
यदि ऐसा कोई आदेश मौजूद है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
और यदि कोई लिखित आदेश नहीं है तो सरकारी संपत्ति की बिक्री की प्रक्रिया किसके निर्देश पर की विभागीय जांच का विषय बनता है।
रविवार को नीलामी की प्रक्रिया पर भी सवाल
शिकायतकर्ता के अनुसार लकड़ी की बिक्री पहले प्रस्तावित थी और मामला सामने आने के बाद प्रक्रिया में बदलाव हुआ। बाद में रविवार के दिन लकड़ी की नीलामी किए जाने की बात सामने आई।
ऐसे में सवाल है कि नीलामी की तारीख किसने तय की?
क्या इसके लिए पूर्व सूचना जारी की गई थी?
क्या सभी इच्छुक खरीदारों को अवसर दिया गया?
क्या नीलामी की कार्यवाही लिखित रूप से दर्ज की गई?
क्या विभागीय अधिकारी मौके पर मौजूद थे?
क्या लकड़ी का सरकारी मूल्यांकन किया गया था?
इन सवालों का जवाब नीलामी से संबंधित दस्तावेजों से ही मिल सकता है।
₹20 हजार की राशि पर विभाग और सरपंच का अलग-अलग पक्ष
मामले का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु फिलहाल लकड़ी की राशि को लेकर सामने आया विरोधाभास है।
सरपंच लोमस साहू का पक्ष उनके अनुसार लकड़ी की ₹20 हजार की राशि रेशम विभाग में जमा कर दी गई है।
विभागीय पक्ष रेशम कार्यालय में मौजूद कर्मचारी ललित कुर्रे की ओर से कथित तौर पर बताया गया कि सरपंच द्वारा अभी तक विभाग में किसी प्रकार की राशि जमा नहीं की गई है।
अब सवाल यह नहीं है कि कौन क्या कह रहा है, बल्कि सवाल यह है कि सरकारी रिकॉर्ड क्या कहता है।
यदि ₹20 हजार जमा हुए हैं तो रसीद होनी चाहिए। संबंधित तारीख की कैशबुक या बैंक एंट्री में उसका उल्लेख होना चाहिए। यदि राशि विभाग में जमा नहीं हुई है तो विभाग को इसकी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
यही दस्तावेज पूरे विवाद की वास्तविक स्थिति सामने ला सकते हैं।
पत्रकार ने सरपंच से पक्ष जानने का प्रयास किया
मामले को लेकर सरपंच लोमस साहू से फोन पर संपर्क कर उनका पक्ष जानने का प्रयास किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।
बताया गया कि फोन पर बातचीत के दौरान सरपंच ने मीटिंग में होने की बात कहते हुए बाद में फोन करने की बात कही थी। इसके बाद दोबारा संपर्क करने का प्रयास किया गया।
समाचार में किसी भी पक्ष का पक्ष प्रकाशित करना पत्रकारिता की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसलिए सरपंच द्वारा कही गई बातों को भी खबर में शामिल किया जा रहा है, ताकि मामला एकतरफा न रहे।
विभागीय अधिकारियों से भी जवाब जरूरी
इस पूरे मामले में विभागीय अधिकारियों से भी स्पष्ट जानकारी अपेक्षित है।
यदि लकड़ी रेशम विभाग की थी तो विभाग को बताना चाहिए कि उसकी नीलामी किस आदेश के तहत हुई।
यदि नीलामी की अनुमति थी तो आदेश सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
यदि अनुमति नहीं थी तो विभाग को यह बताना चाहिए कि लकड़ी की बिक्री कैसे हुई।
साथ ही ₹20 हजार की राशि को लेकर भी विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि उसके रिकॉर्ड में कोई राशि जमा हुई है या नहीं।
पहले की बिक्री का हिसाब भी सामने आए
शिकायत में पहले की लकड़ी बिक्री का हिसाब नहीं दिए जाने का मुद्दा भी उठाया गया था। ऐसे में सिर्फ वर्तमान नीलामी की जांच पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि पहले की बिक्री का रिकॉर्ड भी देखा जाना चाहिए।
कितनी बार लकड़ी बेची गई?
किसके आदेश से बेची गई?
कितनी मात्रा में लकड़ी थी?
कितनी राशि प्राप्त हुई?
राशि किस खाते में जमा हुई?
उसकी रसीद कहां है?
यदि इन सवालों के जवाब रिकॉर्ड में मौजूद हैं तो विवाद स्वतः स्पष्ट हो सकता है।
आरोपों की पुष्टि जांच से ही होगी
मामले में शिकायतकर्ता की ओर से कई आरोप और सवाल उठाए जा रहे हैं। इनमें अधिकारियों और पंचायत के बीच मिलीभगत की आशंका का आरोप भी शामिल है।
हालांकि किसी भी मिलीभगत या वित्तीय अनियमितता को बिना जांच के तथ्य के रूप में नहीं कहा जा सकता। इसकी पुष्टि दस्तावेजों और सक्षम अधिकारी की जांच के बाद ही हो सकती है।
इसलिए पूरे मामले में निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
जांच में नीलामी आदेश, लकड़ी का मूल्यांकन, नीलामी पंचनामा, खरीदारों की जानकारी, बिक्री राशि, रसीद, बैंक रिकॉर्ड, कैशबुक और विभागीय पत्राचार की जांच की जानी चाहिए।
अब सवाल कार्रवाई का
लोहरसी स्थित रेशम विभाग की नर्सरी की लकड़ी की कथित नीलामी ने सरकारी संपत्ति के प्रबंधन और नीलामी प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
सबसे बड़ा सवाल अब ₹20 हजार की राशि को लेकर ह। सरपंच के अनुसार राशि विभाग में जमा है, जबकि विभागीय स्तर पर राशि जमा नहीं होने की बात सामने आ रही है।
यदि राशि जमा हुई है तो उसका प्रमाण सामने आना चाहिए और यदि जमा नहीं हुई है तो विभाग को इसकी आधिकारिक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
इसके साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि नीलामी किसके आदेश से हुई, लकड़ी का मूल्यांकन किसने किया, खरीदार कौन थे और पूरी राशि का सरकारी हिसाब क्या है।
अब देखना यह है कि संबंधित विभाग इन सवालों की जांच कर दस्तावेजों के आधार पर सच्चाई सामने लाता है या मामला केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रह जाता है।



















