जिला गरियाबंद शिवम कॉलेज ऑफ़ नर्सिंग में लैब अधूरी, लाइब्रेरी पर सवाल, शिक्षकों की कमी और एडमिशन के लिए कथित कमीशन का आरोप—फिर भी वर्षों से कैसे चल रहा कॉलेज?
गरियाबंद। नर्सिंग शिक्षा का उद्देश्य ऐसे प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी तैयार करना है, जिनके हाथों में भविष्य में मरीजों की जिंदगी और सुरक्षा होगी। लेकिन गरियाबंद के शिवम कॉलेज ऑफ नर्सिंग को लेकर सामने आ रहे आरोपों ने इसी व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। शिकायतकर्ताओं के अनुसार, कॉलेज वर्षों से संचालित होने के बावजूद आज भी निर्माणाधीन भवन, अपर्याप्त सुविधाओं और कथित अनियमितताओं के आरोपों से घिरा हुआ है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि कॉलेज की मूलभूत सुविधाएं ही पूरी नहीं हैं, तो विद्यार्थियों को प्रवेश और संचालन की अनुमति किस आधार पर मिल रही है?
निर्माणाधीन भवन में नीचे पढ़ाई, ऊपर बालक बालिका निवास
कॉलेज परिसर को लेकर शिकायतकर्ताओं का दावा है कि भवन अभी भी निर्माणाधीन स्थिति में है। नीचे के हिस्से में छात्र-छात्राओं की कक्षाएं संचालित होती हैं, जबकि ऊपर छात्राओं के रहने के लिए कमरे बनाए जा रहे हैं। लाइब्रेरी भी बताया जा रहा है।

ऐसे में सवाल सीधे सुरक्षा व्यवस्था पर है—
एक ही भवन में नीचे लड़के-लड़कियों की कक्षाएं, ऊपर छात्राओं का रहवास और आसपास सुनसान खेत-खलिहान—क्या छात्राओं की सुरक्षा के लिए पर्याप्त इंतजाम हैं?
क्या इस भवन के लिए आवश्यक भवन सुरक्षा, अग्निशमन व्यवस्था, आपातकालीन निकास और छात्रावास संबंधी अनुमतियां उपलब्ध हैं? यदि भवन निर्माणाधीन है तो वहां छात्राओं के रहने की व्यवस्था किस नियम के तहत की कहा की जारही है नर्सिंग शिक्षा में केवल किताबों से काम नहीं चलता। विद्यार्थियों को व्यावहारिक प्रशिक्षण के लिए मानक लैब और पर्याप्त उपकरण चाहिए शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि कॉलेज में लैब की सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं इसका जवाब केवल कागज नहीं, बल्कि मौके पर भौतिक सत्यापन से मिलना होगी रिकॉर्ड में जितनी पुस्तकों का उल्लेख किया जाता है, वास्तविक रूप से उतनी पुस्तकें उपलब्ध नहीं हैं।

यदि दस्तावेज और जमीन पर मौजूद सामग्री में अंतर मिलता है तो यह सामान्य कमी नहीं बल्कि गंभीर जांच का विषय होगा।
कॉलेज की पूर्व लाइब्रेरियन शिक्षिका खिलेश्वरी ध्रुवंशी ने मीडिया को दिए बयान में आरोप लगाया है कि उन्हें पांच विद्यार्थियों का एडमिशन कराने का लक्ष्य दिया गया था। उनका दावा है कि प्रत्येक विद्यार्थी के एडमिशन पर करीब ₹5,000 कमीशन देने की बात कही गई थी।
उनके अनुसार, विद्यार्थियों की सूची और मोबाइल नंबर देकर फोन करने तथा कॉलेज में एडमिशन कराने के लिए कहा जाता था।
बिना नोटिस नौकरी से निकालने का आरोप
पूर्व शिक्षिका का दावा है कि उन्हें बिना लिखित नोटिस के मौखिक रूप से नौकरी से निकालते हुए कहा गया कि वे दोबारा कॉलेज न आएं।
क्या कॉलेज में शिक्षकों की नियुक्ति और सेवा समाप्ति की कोई पारदर्शी व्यवस्था है?
निरीक्षण व्यवस्था पर भी उठे सवाल
शिकायतकर्ताओं ने सबसे गंभीर आरोप निरीक्षण प्रक्रिया को लेकर लगाए हैं। उनका दावा है कि निरीक्षण के समय किराए के शिक्षक और संसाधन दिखाकर कॉलेज को मानक के अनुरूप प्रस्तुत किया जाता है।
क्या निरीक्षण केवल कागजों पर होता है या वास्तव में जमीन पर मौजूद व्यवस्था की जांच होती है?शिकायतकर्ताओं का यह भी आरोप है कि कॉलेज से पढ़ाई पूरी करने वाले कुछ विद्यार्थियों को बाद में उसी कॉलेज में शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया। यदि ऐसा है तो उनकी नियुक्ति के समय निर्धारित शैक्षणिक योग्यता, अनुभव और नियामकीय पात्रता की भी जांच जरूरी है।
जिस संस्थान की शिक्षा और प्रशिक्षण की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हों, उसी संस्थान से निकले विद्यार्थियों को बिना पर्याप्त अनुभव के शिक्षक बनाने से शिक्षा की गुणवत्ता कैसे सुनिश्चित होगी?
मामले में कॉलेज प्रबंधन का पक्ष जानने के लिए संचालिका इंदु आनंद से प्रतिक्रिया लेने का प्रयास किया गया। उन्होंने विस्तृत बयान देने से इनकार करते हुए कहा—इस पूरे मामले में केवल खानापूर्ति की जांच नहीं, बल्कि रिकॉर्ड और जमीन पर मौजूद व्यवस्था का आमने-सामने भौतिकी सत्यापन जरूरी है।क्योंकि मामला सिर्फ एक कॉलेज का नहीं है। मामला उन विद्यार्थियों के भविष्य का है, जो नर्सिंग की पढ़ाई करके कल अस्पतालों में मरीजों की सेवा करेंगे। यदि शिक्षा और प्रशिक्षण में ही समझौता हुआ है, तो इसका जवाबदेह कौन होगा? चिकित्सा शिक्षा विभाग, छत्तीसगढ़ नर्सेज रजिस्ट्रेशन काउंसिल और संबंधित विश्वविद्यालय को चाहिए कि शिवम कॉलेज ऑफ नर्सिंग का स्वतंत्र एवं निष्पक्ष भौतिक निरीक्षण कराया जाए। सवाल अब सिर्फ शिवम कॉलेज से नहीं, उस पूरी व्यवस्था से है जिसने वर्षों से इस कॉलेज को संचालन और प्रवेश की अनुमति दी है। करोड़ों रुपए फीस के नाम से वसूली गई है परंतु बच्चों को सुविधा के नाम पर धोखा दिया गया है
क्या अब होगी निष्पक्ष जांच या फिर फाइलों में ही चलता रहेगा निरीक्षण का खेल?

















