गरियाबंद —
आदिम जाति विकास विभाग गरियाबंद में सूचना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार सामने आया है। विभाग से जुड़ी अनियमितताओं और जनहित से जुड़े समाचार साझा किए जाने के बाद सहायक आयुक्त द्वारा समाचार/सूचना पत्रकार ग्रुप से को बाहर कर दिया गया।
धरोहर संदेश में प्रमुखता से प्रकाशन किया गया समाचार बेरोजगारों को नौकरी के नाम से लाखों की ठगी की गई विभागीय योजनाओं, छात्रावासों, भर्ती और भुगतान से जुड़ी जानकारियां साझा करना किया गया था लेकिन जैसे ही विभाग से संबंधित संवेदन शील सवाल और समाचार ग्रुप में डाले गए, बिना किसी लिखित आदेश और बिना कारण बताए ग्रुप से निष्कासित कर दिया गया।

यह कार्रवाई कई गंभीर सवाल खड़े करती है—
क्या अब शासकीय विभागों में समाचार डालना या चलाना अपराध हो गया है?
क्या अधिकारी अपने पद का दुरुपयोग कर मीडिया को चुप कराने की कोशिश कर रहे हैं?
क्या यह कदम भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को छिपाने का प्रयास नहीं है?

कानून विशेषज्ञों का मानना है कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत सूचना देना और प्रकाशित करना नागरिक का मौलिक अधिकार है। किसी शासकीय अधिकारी द्वारा पत्रकार को ग्रुप से हटाकर सूचना रोकने की कोशिश करना पद का दुरुपयोग माना जा सकता है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मीडिया को सूचना देने पर रोक से संबंधित कोई भी लिखित शासकीय आदेश मौजूद नहीं है, इसके बावजूद डिजिटल माध्यम से दबाव बनाकर खबरों को रोकने का प्रयास किया गया।

अब सवाल यह है कि
क्या शासन-प्रशासन इस मामले में जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करेगा, या फिर सूचना दबाने की यह परंपरा यूँ ही चलती रहेगी?
यह घटना न केवल आदिम जाति विकास विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर बढ़ते दबाव का भी संकेत देती है। विभागीय अधिकारी मीडिया ग्रुप में इतनी दखल अंदाजी क्यों? मीडिया को दबाने का प्रयास विभागीय अधिकारी द्वारा इस प्रकार से करना एवं ग्रुप से निकलने से पहले ग्रुप के सदस्य को यह सूचना देना पड़ता है कि आपके द्वारा किस प्रकार से वीडियो एवं गलत समाचार डाला गया है जिससे समाज में किसी प्रकार से समाज को हानि पहुंच जाते हैं तब किसी व्यक्ति को आप निकल सकते हैं ग्रुप से अन्यथा समाचार के लिए विभागीय समाचार चलने पर पत्रकार को डरने का प्रयास करने का कार्य किया गया है l

















