गरियाबंद छुरा 72 वर्षीया ओमबाई बघेल नगर पंचायत छुरा की दलित महिला ने देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति महोदया तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए एक अत्यंत संवेदनशील कदम न्याय की उम्मीद में खून से पत्र लिखने जैसी कठोर पहल की है। इतना ही नहीं इन्होंने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को भी पत्र भेज कर मामले से अवगत कराया।

बावजूद इसके आज तक किसी भी स्तर पर ठोस कार्रवाई न होने के कारण परिवार और समाज में गहरी निराशा व्याप्त है। अब तक ना जांच शुरू हुई ना सुनवाई।

लंबित न्याय ने बढ़ाई पीड़ा पिछले कई वर्षों से अपनी पैतृक भूमि को लेकर संघर्ष कर रही महिला का आरोप है कि उनकी जमीन पर संतोष सारडा नामक कपड़ा व्यापारी अवैध कब्जा करना चाह रहा है। और संबंधित विभागों में शिकायत करने के बावजूद समाधान नहीं मिल रहा। लगातार उपेक्षा और लंबित कार्रवाई से परेशान होकर संविधानिक संस्थाओं को अपनी पीड़ा भेजी है।

दो बार कोर्ट का फैसला , फिर भी विवाद कायम इस मामले में दो अलग-अलग वर्षों में अदालत में निर्णय दिए।
पहला 2012-13 में तहसील कार्यालय में चला मामला जिसमें स्वर्गीय सुंदर सिंह बघेल विजय हुए। व संतोष सारंडा के ऊपर धारा 1959 एलआरसी के तहत एकतरफा कार्रवाई किया गया।
दुसरा — 2022-23 में कोर्ट ने भूमि का मालिकाना हक किसी दूसरे व्यक्ति को बताया।

यह विरोधाभाषी फैसला इस बात का संकेत देता है कि इस प्रकरण में लेन-देन या दबाव की स्थिति रही है।
राजस्व विभाग के अंदरूनी खुलासे —– गोपनीय जानकारी के अनुसार राजस्व विभाग के एक कर्मचारी ने बताया कि मामले को दबाने के लिए पत्रकारों को दो से ढाई लाख रुपए तक देने की तैयारी की जा रही थी लेकिन जब मामला अधिक तूल पकड़ने लगा तो पूरा प्रयास विफल हो गया।
धूरी धाराएं अधूरी न्याय प्रक्रिया —- ओमबाई बघेल का आरोप है कि आरोपी संतोष सारडा पर पुलिस ने धारा 126 व 135 (3) बी एन एस एस ईस्तगारा लगाई है लेकिन यह धाराएं अधूरी है ।

पीड़िता का कहना है कि संतोष सारडा द्वारा जेसीबी से मठ ( समाधि ) को तोड़ा गया गाली गलौज हुआ धमकी भी दी गई परंतु इन गंभीर आरोपों की धाराएं एफ आई आर में शामिल नहीं की गई। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि पुलिस निष्पक्षता से जांच करें तो कई छुपे हुए तथ्य और दबे हुए स्वर बाहर आ जाएंगे।
मुख्य गवाह रुक्मिणी बाई नेताम का बयान —- 75 वर्षीया रुक्मिणी बाई नेताम पिता स्वर्गीय गूहलेद राम नेताम ने महत्वपूर्ण बयान देते हुए बताया कि
जिस जमीन को संतोष सारडा अपना बताता है दरअसल उसके नाम का है ही नहीं।
उक्त भूमि पहले स्वर्गीय संतोष नेताम मेरे दादा की थी जिन्होंने अपने दामाद हगरू को भांचादान दिया है।
इस भूमि का मालिकाना हक केवल और केवल ओमबाई बघेल के परिवार का है।
इनका परिवार मेरे जीते–जीते तीन–चार पीढियों से इस भूमि पर सब्जी बाड़ी करते आ रहे हैं , जो कब्जे का प्रमाण भी है।
उन्होंने कहा कि मेरे पिताजी का इस भूमि पर कोई अधिकार था ही नहीं।
भूख हड़ताल के बाद भी न्याय अधूरा —– ओमबाई बघेल ने अपने परिवार और समाज के लोगों के साथ भूख हड़ताल भी की लेकिन प्रशासन द्वारा अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
स्थानीय समाज का कहना है कि 72 वर्षीया दलित महिला अपने हक के लिए दर-दर ठोकरे खा रही है फिर भी न्याय दूर है यह व्यवस्था पर बड़ा प्रश्न चिन्ह है।

















